झारखंड राज्य का संवैधानिक प्रमुख राज्यपाल होता है, जिसकी नियुक्ति भारत के राष्ट्रपति द्वारा की जाती है। राज्यपाल का पद भारतीय संविधान के अनुच्छेद 153 से 162 के अंतर्गत वर्णित है। झारखंड के राज्यपाल राज्य की कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका से जुड़े अनेक महत्वपूर्ण कार्यों का निर्वहन करते हैं तथा संविधान के संरक्षक के रूप में कार्य करते हैं।
झारखंड के राज्यपाल की कार्यकारी शक्तियाँ अत्यंत महत्वपूर्ण होती हैं। राज्य की समस्त कार्यकारी शक्तियाँ औपचारिक रूप से राज्यपाल के नाम से प्रयोग की जाती हैं। मुख्यमंत्री की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा की जाती है तथा मुख्यमंत्री की सलाह पर मंत्रिपरिषद के अन्य सदस्यों को नियुक्त किया जाता है। इसके अतिरिक्त राज्य के महाधिवक्ता, राज्य लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष व सदस्यों तथा विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति में भी राज्यपाल की महत्वपूर्ण भूमिका होती है।
राज्यपाल को विधायी शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। वे झारखंड विधानसभा के सत्र को आहूत करने, स्थगित करने तथा विधानसभा को भंग करने की शक्ति रखते हैं। विधानसभा द्वारा पारित किसी भी विधेयक पर राज्यपाल की स्वीकृति आवश्यक होती है। राज्यपाल चाहे तो विधेयक को राष्ट्रपति के विचारार्थ सुरक्षित रख सकते हैं। जब विधानसभा का सत्र नहीं चल रहा हो, तब राज्यपाल अध्यादेश जारी करने की शक्ति भी रखते हैं, जिसका वही प्रभाव होता है जो किसी अधिनियम का होता है।
झारखंड के राज्यपाल को वित्तीय शक्तियाँ भी प्राप्त हैं। राज्य का बजट राज्यपाल की अनुमति से ही विधानसभा में प्रस्तुत किया जाता है। धन विधेयक (Money Bill) राज्यपाल की पूर्व स्वीकृति के बिना विधानसभा में पेश नहीं किया जा सकता। इसके अतिरिक्त राज्य आकस्मिक निधि (Contingency Fund) पर भी राज्यपाल का नियंत्रण होता है।
राज्यपाल को कुछ न्यायिक शक्तियाँ भी दी गई हैं। वे राज्य के किसी भी अपराधी की सजा को कम करने, निलंबित करने अथवा क्षमा करने की शक्ति रखते हैं, विशेष रूप से राज्य कानूनों से संबंधित मामलों में। हालांकि मृत्युदंड के मामलों में अंतिम निर्णय राष्ट्रपति द्वारा लिया जाता है।
इसके अलावा झारखंड के राज्यपाल के पास आपातकालीन एवं विवेकाधीन शक्तियाँ भी होती हैं। यदि राज्य में संवैधानिक तंत्र विफल हो जाए, तो राज्यपाल राष्ट्रपति को रिपोर्ट भेज सकते हैं, जिसके आधार पर राष्ट्रपति शासन लगाया जा सकता है। कुछ परिस्थितियों में राज्यपाल मंत्रिपरिषद की सलाह के बिना भी अपने विवेक से निर्णय ले सकते हैं।
इस प्रकार, झारखंड के राज्यपाल की शक्तियाँ केवल औपचारिक नहीं बल्कि संवैधानिक संतुलन बनाए रखने में अत्यंत महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। वे राज्य सरकार और केंद्र सरकार के बीच सेतु का कार्य करते हैं तथा लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुचारु रूप से संचालित करने में योगदान देते हैं।