भारतीय संविधान की पाँचवीं अनुसूची का विशेष महत्व उन राज्यों के लिए है जहाँ आदिवासी आबादी अधिक संख्या में निवास करती है, और झारखंड ऐसा ही एक प्रमुख राज्य है। पाँचवीं अनुसूची का उद्देश्य अनुसूचित जनजातियों के सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक हितों की रक्षा करना है। यह अनुसूची संविधान के अनुच्छेद 244(1) के अंतर्गत आती है और देश के विभिन्न राज्यों में स्थित अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन और नियंत्रण से संबंधित प्रावधान करती है। झारखंड में आदिवासी समुदाय की बहुलता के कारण राज्य का एक बड़ा भाग पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया है, जिससे यहाँ विशेष प्रशासनिक व्यवस्था लागू होती है।

झारखंड के अधिकांश जिले जैसे रांची, खूंटी, गुमला, सिमडेगा, पश्चिमी सिंहभूम, सरायकेला-खरसावां, लोहरदगा और लातेहार आदि पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत आते हैं। इन क्षेत्रों में सामान्य कानूनों की तुलना में अलग व्यवस्था लागू होती है, ताकि आदिवासियों की भूमि, संसाधन और परंपरागत जीवन शैली की रक्षा की जा सके। पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत राज्यपाल को विशेष अधिकार दिए गए हैं, जिनके माध्यम से वे संसद या राज्य विधानमंडल द्वारा बनाए गए किसी भी कानून को अनुसूचित क्षेत्रों में लागू करने या न करने का निर्णय ले सकते हैं।
पाँचवीं अनुसूची के तहत प्रत्येक राज्य में एक जनजातीय सलाहकार परिषद (Tribal Advisory Council – TAC) का गठन किया जाता है, जिसमें अधिकांश सदस्य अनुसूचित जनजाति से होते हैं। झारखंड में यह परिषद आदिवासियों से जुड़े विषयों पर राज्य सरकार और राज्यपाल को परामर्श देती है। भूमि हस्तांतरण, खनिज संसाधनों का उपयोग, वन अधिकार और स्थानीय स्वशासन जैसे विषयों में यह परिषद महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
झारखंड जैसे खनिज-संपन्न राज्य में पाँचवीं अनुसूची का महत्व और भी बढ़ जाता है, क्योंकि यह आदिवासी भूमि को बाहरी हस्तक्षेप से बचाने में सहायक है। हालाँकि व्यवहार में कई बार इसके प्रावधानों के प्रभावी क्रियान्वयन को लेकर प्रश्न उठते रहे हैं, फिर भी संवैधानिक दृष्टि से यह अनुसूची आदिवासी समाज के संरक्षण का एक मजबूत आधार प्रदान करती है। इस प्रकार, पाँचवीं अनुसूची और झारखंड का संबंध न केवल संवैधानिक है, बल्कि यह राज्य की सामाजिक संरचना और आदिवासी अस्मिता से भी गहराई से जुड़ा हुआ है।