1905 ईस्वी का बंगाल विभाजन भारतीय इतिहास की एक अत्यंत महत्वपूर्ण और विवादास्पद घटना थी, जिसे ब्रिटिश औपनिवेशिक सरकार ने सुनियोजित षड्यंत्र के तहत लागू किया। उस समय भारत अंग्रेजों के अधीन था और भारतीय जनता के पास शासन में भागीदारी का कोई वास्तविक अधिकार नहीं था। 1885 ईस्वी में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की स्थापना के बाद देश में राष्ट्रवादी चेतना का तीव्र प्रसार होने लगा, जिससे अंग्रेजी सरकार पर राजनीतिक दबाव बढ़ने लगा। इस बढ़ती एकता और राष्ट्रवाद से भयभीत होकर अंग्रेजों ने “फूट डालो और राज करो” की नीति अपनाई और बंगाल जैसे बड़े तथा राजनीतिक रूप से सक्रिय प्रांत को विभाजित करने की योजना बनाई।

अंग्रेजों ने बंगाल विभाजन के पक्ष में यह तर्क दिया कि बंगाल प्रांत अत्यधिक विशाल है और इसके अंतर्गत वर्तमान पश्चिम बंगाल, बिहार, झारखंड, ओडिशा, असम और बांग्लादेश जैसे क्षेत्र आते हैं, जिनका प्रशासन सुचारु रूप से करना कठिन है। इसलिए प्रशासनिक सुविधा बढ़ाने के लिए बंगाल को दो भागों में बाँटना आवश्यक है। किंतु यह तर्क केवल एक बहाना था, क्योंकि वास्तविक उद्देश्य भारतीय समाज को धार्मिक आधार पर विभाजित करना था। 19 जुलाई 1905 को तत्कालीन वायसराय लॉर्ड कर्जन ने बंगाल विभाजन की घोषणा की और 16 अक्टूबर 1905 को इसे लागू कर दिया गया।
इस विभाजन के अंतर्गत पश्चिमी बंगाल में बंगाल, बिहार, झारखंड और ओडिशा को शामिल किया गया, जो मुख्यतः हिन्दू बहुल क्षेत्र थे, जबकि पूर्वी बंगाल में असम और वर्तमान बांग्लादेश को शामिल किया गया, जो मुस्लिम बहुल क्षेत्र था और जिसकी राजधानी ढाका बनाई गई। इस प्रकार यह स्पष्ट हो गया कि बंगाल विभाजन केवल भौगोलिक नहीं बल्कि हिन्दू-मुस्लिम आधार पर किया गया विभाजन था। इससे भारतीय समाज की एकता को गहरी चोट पहुँची और सांप्रदायिक तनाव बढ़ने लगा।
बंगाल विभाजन के विरुद्ध पूरे देश में तीव्र जन-आंदोलन शुरू हुआ, जिसे स्वदेशी आंदोलन और बंग-भंग आंदोलन के नाम से जाना जाता है। इस आंदोलन के अंतर्गत विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार और स्वदेशी वस्तुओं के प्रयोग पर ज़ोर दिया गया। बाल गंगाधर तिलक, लाला लाजपत राय और बिपिन चंद्र पाल जैसे राष्ट्रवादी नेताओं ने इस आंदोलन का नेतृत्व किया, जिन्हें ‘लाल-बाल-पाल’ के नाम से जाना जाता है। इसी काल में बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा रचित ‘वंदे मातरम्’ राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बन गया और लोगों में देशभक्ति की भावना जागृत हुई।
लगातार जन-विरोध और आंदोलन के दबाव में अंततः अंग्रेजों को झुकना पड़ा और 1911 ईस्वी में बंगाल विभाजन को रद्द कर दिया गया। इसी वर्ष भारत की राजधानी को कोलकाता से दिल्ली स्थानांतरित कर दिया गया। हालाँकि विभाजन रद्द हो गया, लेकिन इसके दुष्परिणाम समाप्त नहीं हुए। 1906 ईस्वी में ढाका में मुस्लिम लीग की स्थापना हुई, जिसने आगे चलकर मुस्लिम राजनीति को संगठित किया और अलग मुस्लिम राष्ट्र की माँग को बल दिया।
इस प्रकार बंगाल विभाजन 1905 ने भारत में सांप्रदायिक राजनीति की नींव रखी, जिसका अंतिम परिणाम 1947 में भारत के विभाजन के रूप में सामने आया। यह घटना स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि अंग्रेजों की नीति केवल शासन करने की नहीं थी, बल्कि भारतीय समाज को भीतर से कमजोर करने की थी। इसलिए बंगाल विभाजन को केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि भारतीय इतिहास की सबसे घातक औपनिवेशिक चालों में से एक माना जाता है।