मनरेगा की जगह नया VB-G RAM G विधेयक 2025: ग्रामीण रोजगार व्यवस्था में क्या बदलेगा?

केंद्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार प्रणाली में बड़े सुधार के उद्देश्य से विकसित भारत – रोजगार और आजीविका गारंटी मिशन (ग्रामीण) विधेयक 2025 पेश किया है। यह प्रस्तावित कानून वर्ष 2005 में लागू हुई मनरेगा योजना का स्थान लेगा। सरकार का दावा है कि नया ढांचा अधिक आधुनिक, तकनीक-आधारित और जवाबदेह होगा, जबकि आलोचक इसे राज्यों पर अतिरिक्त बोझ डालने वाला कदम मान रहे हैं।

नीचे इस विधेयक के प्रमुख प्रावधानों, संभावित प्रभावों और उठ रही चिंताओं को सरल और स्पष्ट रूप में समझाया गया है।

नए विधेयक में किए गए प्रमुख बदलाव

सबसे बड़ा बदलाव रोजगार के दिनों की गारंटी से जुड़ा है। नए कानून के तहत प्रत्येक ग्रामीण परिवार को अब 125 दिनों के रोजगार का कानूनी अधिकार मिलेगा। पहले यह सीमा 100 दिन थी, जिसे विशेष परिस्थितियों में ही बढ़ाया जाता था।

दूसरा अहम बदलाव केंद्र-राज्य फंडिंग पैटर्न में किया गया है। अब मजदूरी की लागत केंद्र और राज्यों के बीच साझा होगी। अधिकांश राज्यों को मजदूरी खर्च का 40% तक वहन करना होगा, जबकि मनरेगा में यह जिम्मेदारी लगभग पूरी तरह केंद्र सरकार की थी।

इसके अलावा, श्रम बजट प्रणाली को समाप्त कर मानक आवंटन व्यवस्था लागू की गई है। अब केंद्र सरकार तय मानदंडों के आधार पर राज्यों को सालाना फंड देगी। यदि खर्च इससे अधिक हुआ, तो उसकी भरपाई राज्य सरकारों को करनी होगी।

खेती के मौसम और योजना संरचना में बदलाव

नए कानून में खेती के चरम मौसम को ध्यान में रखते हुए बड़ा प्रावधान जोड़ा गया है। बुवाई और कटाई के समय सार्वजनिक कार्यों पर रोक लगाई जा सकेगी। राज्यों को हर वर्ष कुल 60 दिनों की ऐसी अवधि अधिसूचित करनी होगी, ताकि खेतों में मजदूरों की कमी न हो।

योजना निर्माण की प्रक्रिया भी बदली गई है। अब सभी कार्य विकसित ग्राम पंचायत योजनाओं से शुरू होंगे और ब्लॉक, जिला व राज्य स्तर पर समेकित किए जाएंगे। इन योजनाओं को राष्ट्रीय ग्रामीण बुनियादी ढांचा स्टैक से जोड़ा जाएगा, जिसमें जल सुरक्षा, ग्रामीण सड़कें, आजीविका और जलवायु शमन जैसे क्षेत्र शामिल हैं।

ग्रामीण अर्थव्यवस्था, किसानों और मजदूरों पर असर

सरकार के अनुसार, यह नया कानून ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार के साथ-साथ स्थायी बुनियादी ढांचे के निर्माण को बढ़ावा देगा। जल संरक्षण, सिंचाई, ग्रामीण संपर्क और बाजार सुविधाओं में सुधार से कृषि उत्पादकता बढ़ने की उम्मीद है।

किसानों को खेती के मौसम में मजदूरों की बेहतर उपलब्धता, मजदूरी लागत में स्थिरता और बेहतर सिंचाई सुविधाओं का लाभ मिल सकता है। वहीं ग्रामीण मजदूरों के लिए रोजगार के दिनों में वृद्धि, डिजिटल भुगतान, समय पर मजदूरी और काम न मिलने पर बेरोजगारी भत्ता जैसे प्रावधान जोड़े गए हैं।

जवाबदेही, तकनीक और उठती चिंताएं

नई व्यवस्था में निगरानी को मजबूत करने पर विशेष जोर दिया गया है। AI आधारित धोखाधड़ी पहचान, GPS से कार्य निगरानी, सार्वजनिक डेटा प्रकटीकरण और नियमित सामाजिक ऑडिट जैसे उपाय शामिल किए गए हैं।

हालांकि आलोचकों का कहना है कि राज्यों पर बढ़ता वित्तीय बोझ, मांग-आधारित प्रणाली का खत्म होना और खेती के मौसम में काम पर रोक से वास्तविक रोजगार के दिन घट सकते हैं। साथ ही, संघीय ढांचे में संतुलन को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं।

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