टाना भगत आंदोलन झारखंड के आदिवासी इतिहास का एक महत्वपूर्ण धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था, जिसकी शुरुआत 20वीं शताब्दी के प्रारंभ में हुई। यह आंदोलन मुख्य रूप से उरांव (कुड़ुख) जनजाति से संबंधित था और इसका नेतृत्व जतराभगत ने किया था। इस आंदोलन का उद्देश्य आदिवासियों को सामाजिक बुराइयों, अंधविश्वासों और ब्रिटिश शासन द्वारा लगाए गए अन्यायपूर्ण करों से मुक्त कराना था। टाना भगत आंदोलन ने आदिवासी समाज में नैतिक शुद्धता, सादगी और आत्मसम्मान की भावना को जागृत किया।

टाना भगत आंदोलन का धार्मिक स्वरूप अत्यंत महत्वपूर्ण था। इसके अनुयायी मूर्तिपूजा, बलि प्रथा और नशाखोरी का विरोध करते थे। वे सत्य, अहिंसा, शुद्ध जीवन और ईश्वर की एकता में विश्वास रखते थे। टाना भगत सफेद वस्त्र पहनते थे और अनुशासित जीवन जीने पर बल देते थे। यह आंदोलन बिरसा मुंडा के उलगुलान आंदोलन से प्रेरित माना जाता है, क्योंकि दोनों आंदोलनों का उद्देश्य आदिवासी समाज का उत्थान और शोषण के विरुद्ध संघर्ष था।
ब्रिटिश शासन के समय टाना भगत आंदोलन ने राजनीतिक रूप भी धारण कर लिया। टाना भगतों ने लगान, बेगार और जबरन करों का विरोध किया। बाद के समय में इस आंदोलन पर महात्मा गांधी के विचारों का प्रभाव पड़ा और टाना भगतों ने असहयोग आंदोलन में सक्रिय भागीदारी निभाई। गांधीजी की अहिंसा और सत्य की नीति से प्रेरित होकर टाना भगतों ने स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
टाना भगत आंदोलन ने झारखंड के आदिवासी समाज में सामाजिक सुधार की मजबूत नींव रखी। इस आंदोलन के कारण आदिवासियों में शिक्षा, स्वाभिमान और संगठन की भावना विकसित हुई। आज भी टाना भगत आंदोलन को झारखंड के इतिहास में एक जागरणकारी आंदोलन के रूप में याद किया जाता है, जिसने आदिवासी समाज को नई दिशा दी और स्वतंत्रता संघर्ष में अपनी विशेष पहचान बनाई।