जमींदारी व्यवस्था क्या थी?
जमींदारी व्यवस्था एक ऐसी भूमि-राजस्व प्रणाली थी, जिसमें जमींदार किसानों से लगान (कर) वसूल करता था और उसका एक निश्चित भाग सरकार को देता था। किसान भूमि का वास्तविक स्वामी नहीं माना जाता था, बल्कि वह जमींदार पर निर्भर रहता था।

भारत में जमींदारी व्यवस्था की शुरुआत
- 1793 ई. में लॉर्ड कॉर्नवालिस द्वारा
- स्थायी बंदोबस्त (Permanent Settlement) के माध्यम से
- मुख्यतः बंगाल, बिहार और उड़ीसा में लागू की गई
जमींदार कौन थे?
- ब्रिटिश सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त व्यक्ति
- भूमि के मालिक नहीं, बल्कि राजस्व संग्रहकर्ता
- सरकार को निश्चित लगान देना उनका दायित्व था
- लगान न देने पर उनकी जमीन जब्त हो सकती थी
जमींदारी व्यवस्था की मुख्य विशेषताएँ
- स्थायी लगान – जमींदार पर तय लगान स्थायी था
- किसानों का शोषण – मनमाना लगान, बेदखली
- भूमि पर किसानों का अधिकार नहीं
- कृषि में निवेश का अभाव
- बिचौलिया व्यवस्था – किसान ↔ जमींदार ↔ सरकार
जमींदारी व्यवस्था के लाभ (सरकार के लिए)
- सरकार को निश्चित राजस्व
- प्रशासनिक बोझ कम
- ब्रिटिश सत्ता को स्थानीय समर्थन
जमींदारी व्यवस्था के दुष्परिणाम
- किसानों की गरीबी और ऋणग्रस्तता
- कृषि उत्पादन में गिरावट
- बार-बार अकाल
- ग्रामीण विद्रोहों को जन्म
जमींदारी व्यवस्था के विरुद्ध विद्रोह
- संथाल विद्रोह (1855–56)
- नील विद्रोह (1859–60)
- चुआर विद्रोह
- बिरसा मुंडा का उलगुलान (1899–1900) – झारखंड क्षेत्र में
स्वतंत्र भारत में जमींदारी उन्मूलन
- 1950 के बाद विभिन्न राज्यों में जमींदारी उन्मूलन कानून
- जमींदारी उन्मूलन अधिनियम
- भूमि का स्वामित्व सीधे किसानों को
जमींदारी व्यवस्था ने भारतीय ग्रामीण समाज को गहराई से प्रभावित किया। यह व्यवस्था औपनिवेशिक शोषण का प्रतीक थी, जिसके कारण कृषि, किसान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान हुआ। स्वतंत्रता के बाद इसका उन्मूलन एक महत्वपूर्ण सामाजिक-आर्थिक सुधार था।