भारत की जनजातीय और जातीय विविधता में, खरवार समुदाय का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण और विशिष्ट है। यह समुदाय इतिहास, संस्कृति, उत्पत्ति और परंपरा की दृष्टि से समृद्ध, प्राचीन और बहुआयामी पहचान रखता है।
झारखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार और छत्तीसगढ़ के पर्वतीय, वनों से घिरे और पठारी क्षेत्रों में मूल रूप से बसे इस समुदाय ने सदियों के संघर्ष, प्रवास, शासन, सामाजिक परिवर्तन और सांस्कृतिक विकास को अपने भीतर समेटा है।
खरवारों को कई क्षेत्रों में राजपूत मूल (राजाओ के पुत्र), कई में अनुसूचित जनजाति, और कुछ स्थानों पर पिछड़ा वर्ग के रूप में दर्ज किया गया है। यह वर्गीकरण इस समुदाय की ऐतिहासिक विविधता और जटिल पहचान को दर्शाता है।

इस विस्तृत लेख में हम खरवार समुदाय की उत्पत्ति, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, संस्कृति, धार्मिक मान्यताएँ, जीवनशैली, लोक-परंपराएँ और सांस्कृतिक धरोहर का गहन अध्ययन करेंगे।
खरवार जाति की उत्पत्ति
खरवार समुदाय की उत्पत्ति के बारे में विभिन्न सिद्धांत प्रचलित हैं, जिन्हें तीन मुख्य श्रेणियों में समझा जा सकता है:
खरवार समुदाय अपनी परंपरागत मान्यता के आधार पर स्वयं को सूर्यवंशी इक्ष्वाकु वंश का हिस्सा मानता है।
इसके अनुसार:
- खरवारों का वंशज संबंध भगवान श्रीराम से जुड़ा माना जाता है।
- वे स्वयं को सूर्यवंशी की शाखा बताते हैं।
- कई लोकगीतों और वंशावलियों में “खरवार राजा रघुवंशी है” तथा “संतन के राजा खरवार/खेरवार” जैसी अभिव्यक्तियाँ मिलती हैं।
खरवार सत्य बोले जाने के लिए जाते थे, सत्य तथा सवतंत्रता के लिए अपनी जान भी देने को तैयार रहते थे। खरवार “रघुकुल रीत सदा चलिजाये प्राण जाये पर वचन न जाये” के सिद्धांत पर रहते थे।
खरवार समुदाय का इतिहास
खरवार समुदाय का इतिहास अत्यंत व्यापक और रोचक है। इसे चार बड़े कालखंडों में समझना सबसे आसान है:
1. प्राचीन काल
प्राचीन काल में:
- खरवार समुदाय पहाड़ी वनों में रहने वाला
- स्वतंत्र, स्वाभिमानी और कृषक
- कई छोटे-छोटे वन-ग्राम-राज्य चलाने वाला
- और ग्राम प्रमुख/मुखिया-आधारित शासन व्यवस्था का पालन करने वाला समुदाय था।
पुरातात्विक और लोक-इतिहास में संकेत मिलते हैं कि:
- इनके छोटे राज्यों में “खरवार राज” की अवधारणा थी।
- वे सूर्य पूजा के अनुयायी थे।
- सामाजिक जीवन कृषि, पशुपालन और वनों पर आधारित था।
2. मध्यकालीन इतिहास
खरवार समुदाय का सबसे प्रमुख ऐतिहासिक काल मध्यकालीन माना जाता है।
रोहतासगढ़ किले पर शासन
लोक-परंपराओं और कुछ ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार
- रोहतासगढ़ किले (वर्तमान बिहार) के प्रारंभिक शासकों में खरवारों का नाम मिलता है।
- “खरवार राजा प्रतापधवल देव”, “सहस धवल देव”, “विक्रम धवल देव” आदि नाम राजाओ के नाम शिला लेखो में उल्लेखित मिले हैं।
पलामू-गढ़वा क्षेत्र पर नियंत्रण
छोटानागपुर पठार के पश्चिमी भाग—विशेषकर गढ़वा, पलामू, लातेहार, चतरा आदि क्षेत्रो में खरवारों का प्रभाव व्यापक था।
3. औपनिवेशिक काल
ब्रिटिश शासन के दौरान खरवार समुदाय ने महत्वपूर्ण बदलावों का सामना किया।
आर्थिक परिवर्तन
- जंगल कानून के कारण पारंपरिक अधिकार सीमित हुए।
- वन उत्पादों पर सरकारी नियंत्रण बढ़ा।
- कर वसूली और जमीन सर्वेक्षण ने समुदाय को प्रभावित किया।
आंदोलनों में भागीदारी
खरवार समुदाय ने औपनिवेशिक नीतियों—विशेषकर: जंगल कर, जमीन कब्जा, जबरन श्रम (बेगारी) के खिलाफ आवाज उठाई।हालाँकि इन संघर्षों का व्यापक दस्तावेजीकरण उपलब्ध नहीं है, लेकिन जन-स्मृतियों में उनका स्थान दर्ज है।
4. स्वतंत्रता के बाद का काल
स्वतंत्रता के बाद:
- सामंतवादी ढाँचा ढहा
- वन क्षेत्र संरक्षित घोषित हुए
- भूमि का पुनर्वितरण हुआ
- शिक्षा और आधुनिक रोजगार की दिशा में समुदाय ने कदम बढ़ाया
आज समुदाय का एक बड़ा हिस्सा : खेती, मजदूरी, स्थानीय व्यापार, वन-उत्पाद आधारित कार्य, सरकारी नौकरियों में शामिल है।
खरवार समुदाय की संस्कृति
खरवारों की संस्कृति अत्यंत समृद्ध, विविध और पारंपरिक है। उनकी संस्कृति का केंद्र है प्रकृति, सूर्य पूजा, ग्राम देवी, ग्राम डीहवार पूजा त्योहार, लोकगीत और सामाजिक सम्बंध।
खरवार जाती का गोत्र / पारिस
खरवार जाती में 7 गोत्र होते है जिसको पारिस भी कहा जाता है
| मंझियाँ | बिस्ट |
| भोक्ता नोट : भोक्ता, खरवार जाती का पारिस है और एक अन्य ” भोक्ता अलग जाती भी होता है.” | राउत |
| कुंवर | |
| महतो | Source : यह जानकारी पलामू जिला के बड़े बुजुर्गो से लिया गया है. |
धर्म और मान्यताएँ
खरवारों का धर्म पूरी तरह:
- पारंपरिक हिंदू स्थापित
- प्रकृति आधारित
- देवी-देवता केंद्रित है।
वे मुख्यतः निम्न देवी-देवताओं की पूजा करते हैं:
- सूर्य देव (मुख्य देवता)
- ग्राम देवी
- धरती माता
- ग्राम देवता / डीहवार
- वृक्ष-देवता / फसल की पूजा / हरियरी पूजा
- पूर्वज-देवता (पुरखिया पूजा)
सामाजिक ढाँचा
खरवार समुदाय का सामाजिक ढाँचा परंपरागत रूप से: पट्टी-आधारित, परिवार प्रमुख केंद्रित, मुखिया प्रणाली पर आधारित रहा है। पुराने समय में समुदाय की बैठकें “परहा पंचायत” के समान स्थानीय स्तर पर होती थीं।
इन पंचायतों में विवाद समाधान, विवाह निर्णय और सामाजिक नियम तय किए जाते थे।
खरवार समुदाय भारत का एक प्राचीन, गौरवशाली और सांस्कृतिक रूप से समृद्ध समुदाय है।
यह समुदाय न केवल अपनी पारंपरिक पहचान को संभाले हुए है, बल्कि आधुनिक समय की आवश्यकताओं के अनुसार स्वयं को बदल रहा है।
उनका इतिहास हमें बताता है कि:
वे स्वतंत्रता-प्रिय थे, प्रकृति-आधारित जीवन जीते थे, उनके पास स्थानीय शासन प्रणाली थी, उनकी सांस्कृतिक जड़ें गहरी थीं